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शनिवार, 6 जून 2015

श्रमजल

मेरी  महत्वाकांक्षा का  जन्म हुआ था 
वहाँ, उस  चोटी पर। 
आँख बंद करते  ही  पहुँचती  थी 
जहाँ, उसके सिरे पर। 
धरती  थी  बहुत  नीचे, 
आसमां  था  बहुत  पास। 
जगी  हुई थी,  सैकड़ों  प्यास, 
प्यास बुझाने के  थे  साधन  अनेक, 
जुटा  कर  हिम्मत , बढ़ाना  था  हाथ। 
उठाना  था  एक  ऐसा  गिलास, 
जिसमें  हो  पसीने की  मीठी सुवास। 
आकांक्षा  का घोल  घुला  हो  शर्करा  सा, 
श्रमजल में,  स्वेदकण में। 

रविवार, 24 मई 2015

ऐ ज़िंदगी मुझे तुमसे प्यार


ज़िंदगी , ऐ  ज़िंदगी 

मुझे तुमसे प्यार, 
मुझे  तुमसे प्यार। 
तुम  एक  रास्ता  हो, 
जो  चलता है  अनवरत, लगातार। 


कभी जंगल, कभी  बगीचा, 

कभी  चौरस्ता, कभी  मिलता है  हाट। 
हर  एक  रास्ते   से  है, 
ऐ  ज़िंदगी  मुझको  प्यार। 


सुख  भी है,  दु:ख  भी है, 

यहां  गम  अनेक, खुशियाँ  हज़ार। 
तेरे  हर  भाव से, मुझको  प्यार। 
ऐ  ज़िंदगी  मुझे तुमसे प्यार। 


चलना  भी है, रुकना  भी है, 

मुड़ना  भी है,  झुकना  भी है। 
तेरे  हर  एक  कदम  पर  मेरा  ऐतबार। 
ऐ  ज़िंदगी , मुझे  तुमसे प्यार। 


यहां  दोस्त  भी,  दुश्मन  यहां, 

अजनबी  यहीं, यहीं  जांनिसार, 
इस  राह  के  हर  राही  से  प्यार, 
ऐ  ज़िंदगी, मुझे  तुमसे प्यार। 


चाहे  मंज़िल  हो  या  रास्ता, 

या  मील का पत्थर  कोई, 
चलता  हर  कदम  लगे  बेमिसाल, 
ऐ  ज़िंदगी  मुझे तुमसे प्यार। 


पहाड़ के  ऊँचे  दरख्त  से  प्यार, 

खाड़ी  की  उड़ती  चिड़िया  से प्यार। 
ऐ  ज़िंदगी  मुझे तुमसे प्यार, 
ऐ  ज़िंदगी  मुझे तुझसे प्यार। 
                                    - पल्लवी गोयल 

बुधवार, 20 मई 2015

जंगल का राजा



अभी - अभी  मेरी  हुई , जंगल में  उससे  भेंट, 

बड़ी  सी  पूंछ, पैने  पंजे  लिए  रहा था  लेट। 

लेटे  ही  उसने  पूछा, अरे  हुई  क्या  बात ? 
आज  बड़े  दिन  बाद हुई , तुमसे  मुलाकात । 

आओ  दो-दो   हाथ  हो  जाए , शतरंज की  बाज़ी, 
ज़रा  आवाज़  लगा  देना, कुछ  खाने को दे  जाए, सिंहनी  आजी।

मयूर  ज़रा  आकर  रांभा-सांभा  दिखला जाए, 
ज़िंदगी  भरपूर  मजे  की,  चलो  ज़रा  जीया  जाए।

शतरंज  बिछी, बाज़ी  लगी, फेंका  पासे  पर  पासा, 
अगला  पासा  उल्टा  पड़  गया,  पलट गया  सब  पासा। 

मैं था  नीचे,  वह  था  ऊपर, गुर्र - गुर्र - गुर्र  गुर्राता, 
बड़े  नुकीले,  तीखे,  चोखे , दाँत मुझे  दिखलाता। 

आँख  मींचकर, आँख  जो खोली, 

पलंग था  ऊपर,  मैं  था  नीचे, तकिया  मेरे  ऊपर, 
साँस  आ गई,  दम  आ  गया,  सपना  था  वह  केवल। 
                    



श्री राम वंदन


कौशल्या  नंदन  को  मेरा  वंदन, 
शत-शत  उन्हें प्रणाम। 
असुर, निशाचर  दुष्ट दलन  कर, 
ऋषि -  मुनियों को  दिया  विश्राम। 
कैकेयी  संग  दशरथ  की 
गोद में  अपूर्व  शोभायमान। 
सिंहासन  तज  फांकी  वन - रज
पितृ  वचन  को  दिया  सम्मान। 

भ्राता  को  सिंहासन  सौंपा, 
मातृप्रेम  का  दिया  प्रमाण। 
वानर,  रिछ , भालू  संग  रहकर, 
प्रकृति  प्रेम  का  दिया ज्ञान। 
संग  लंका,  लंकाधिपति  विनष्ट  कर, 
नष्ट  किया , विनाशी  का  अभिमान। 
त्याग दिया  प्रिय  भार्या  को भी ,
 राजकुल,  राजमर्यादा  के  नाम। 
आदर्शवादी, रघुकुलशिरोमणि, प्रजापालक, 
अयोध्यापति  श्रीराम  है  इनका नाम। 
ऐसे  श्री राम  को  मेरा  वंदन, 
शत-शत उन्हें प्रणाम। 

सोमवार, 11 मई 2015

अपनी नज़र


प्रशंसा  है व्यक्ति  की  सबसे बड़ी  कमज़ोरी, 
इसपर  विजय  पाना है  बहुत  ज़रूरी। 
नज़रें  खोजतीं हैं  एक  ऐसी  नज़र, 
जो  नज़रों में  ऊँचा  उठा  सके। 
पर  ये  खोजतीं  नज़रें, 
नज़र  नहीं  आतीं, 
नज़रों से  ज़रा सा  नीचे, 
आत्मा  के  सामने  नज़रें  झुकाए। 
हम  क्यों नहीं  आत्मा को  अपनी  नज़र  बनाते , 
खूबियों  और  कमियों  का  पलड़ा  उनसे  तुलवाते। 

रविवार, 10 मई 2015

बापू

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भारत  में जन्म  लिया 
विदेशों  में खत्म  की  पढ़ाई।
डिग्री तक  लेकर  पहुँचे  भारत में, 
अंग्रेजों की  लीला  रास  न  आई। 
विदेशी  उतार, देशी  पहन कर  
स्वदेशी  की  गुहार  लगवाई। 
डांडी  मार्च  की फेरी  लेकर, 
नमक  पहुंचाया  जन  तक  भाई। 
लंबी  लाठी  लिए  हाथ में, 
स्वतंत्रता  की  हुँकार  उठाई। 
गोल  चश्मा  टिका  नाक  पर, 
देश की  हर  समस्या  सुलझाई। 

बुधवार, 6 मई 2015

ईश्वर



कंकड,  पत्थर, धरती, बादल,

या  हो  नीला  आकाश ।
मुझमें, तुझमें, हवा  और  जल  में,
मिलता है  हरदम  आभास
पशु, पक्षी, कीट पतंगें,
सूर्य, चंद्र  में  भी  है  वास।
धमधम, गुनगुन, झरझर, टपटप,
सभी  हैं  मेरी  आवाज़।
चाहे  कहीं आओ , जाओ,
रहे  हमेशा  मेरा  साथ।
बूझ  सको  तो  बूझ  लो  मुझको,
तुम्हें  किस  नाम से   मेरा अहसास। 

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

पहाड़ और गिलहरी


काले  पहाड़  और झबरीली  गिलहरी में
बहस  हुई एक  बार।
श्रेष्ठ  कौन है  तुच्छ  कौन,
गिलहरी  या  पहाड़।
पहाड़  बड़ा  सा  काला - काला,
गिलहरी  छुद्र  लाचार।
पूंछ  झबरीली , सुंदर , सुकोमल,
तीन  लहरें  काली  चमकदार।
गरज पहाड़  बोला  उस  छुद्र  से,
तू क्या क्या  कर  सकती कार्य।
मैं  बुलाता  बारिश  की  बूंदें,
खग  मृग  करते  मुझमें  वास।
मुझसे बनते मकान  अति सुन्दर,
मैं  हूँ  वह  अनन्त  अपार।
विहँस  बहुत  धीरे से बोली,
छुद्र  उठाती  विनय  का  भार।
भैया  पहाड़!  मैं  चढ़ती  इस  पेड़ पर,
तू  चढ़  दिखला  दे  एक  बार।


सोमवार, 27 अप्रैल 2015

प्रथम उड़ान


आशाओं के  पंख  लगा  कर
जब  प्रथम  उड़ान  सजाते।

आसमान  के  सातों  रंग,
चुरा  आंखों में  समाते।

चंदा  की  शीतलता  मानो,
माथे पर  थम  जातीं।

सूरज की  प्रथम  किरण,
मुखमंडल  पर  फूटी  आतीं।

कभी - कभी  घनेरे  बादल,
किरणों  को  ढक  लेते।

पुनः हठीली  चंचल  किरणें,
चेहरे  को  जगमग  करतीं।

गंतव्य  पाते ही  ये  सगर्व,
यूँ  गर्दन  उचकाते।

मानो  जीत  लिया  जग  सारा
फूले  नहीं समाते


पहाड़ और धरती

हरी  हरी  घास , पहाड़ी  को  यूं  ढककर  रहती।
मानो  प्यारी  धरती   चुनरी  के  नीचे  छिपकर बैठी।
प्रियतम  पहाड़  दूर  गर्वीले  खड़े  हुए,
बादल  के  कोहरे  की  पगड़ी से  माथा  ढके हुए,
कहते , तू ज़रा  न  चिंता  कर  ओ  प्यारी!
डट के  खड़ा  हुआ  हूँ ,  राह में  अड़ा  हुआ  हूँ।
कंधे पर  सवारी  कर मेरे  जो  आएगा,
नितांत तेरा  अपना  ही  तुझे  पाएगा।
यदि  अजनबी  कोई  चढ़ा  जो इस  सीने पर,
तुझपर  बुरी  नज़र  डाले , अपने  मन में।
दुःसाध्य, दुर्बोध, दुर्गम्य  बन  उसे  रोकूँगा।
तेरी  रक्षा  में  सदा  तत्पर  रहूँगा।