मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

जीवन अपने सम..


जीवन के इस कठिन सफर में,
चलते जाना मुश्किल जग में।
राह में कई बवंडर होंगे ,
कई शांत से झोंके भी।
कई राह के रोड़े होंगे ,
कई मील के पत्थर भी।
कई संविधान होंगे हम पर,
कई नियम हल्के-फुल्के से।
सोच हमारी अपनी है,
 क्या ले क्या ठुकरा दे हम।
हर एक बहती सरिता में,
 न कोई समरस धारा है।
क्या बोएँ, उगाएँ ,काटे खाएँ
 यह अधिकार हमारा है।
आओ इस जटिल गुत्थी को ,
खुद से खुद सुलझा ले हम।
जीवन को अपने सम ही
 जी कर हम दिखला दे बस।

पल्लवी गोयल
चित्र गूगल से साभार 

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 20 फरवरी 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. सुंदर संदेश। अच्छी रचना।

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  3. हर एक बहती सरिता में,
    न कोई समरस धारा है।
    क्या बोएँ, उगाएँ ,काटे खाएँ
    यह अधिकार हमारा है।
    वाह!!!!
    लाजवाब सृजन

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  4. वाह!!!
    बहुत ही सुन्दर प्रेरक लाजवाब सृजन।

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