7607529597598172 हिंदी पल्लवी: पहाड़ और धरती

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

पहाड़ और धरती

हरी  हरी  घास , पहाड़ी  को  यूं  ढककर  रहती।
मानो  प्यारी  धरती   चुनरी  के  नीचे  छिपकर बैठी।
प्रियतम  पहाड़  दूर  गर्वीले  खड़े  हुए,
बादल  के  कोहरे  की  पगड़ी से  माथा  ढके हुए,
कहते , तू ज़रा  न  चिंता  कर  ओ  प्यारी!
डट के  खड़ा  हुआ  हूँ ,  राह में  अड़ा  हुआ  हूँ।
कंधे पर  सवारी  कर मेरे  जो  आएगा,
नितांत तेरा  अपना  ही  तुझे  पाएगा।
यदि  अजनबी  कोई  चढ़ा  जो इस  सीने पर,
तुझपर  बुरी  नज़र  डाले , अपने  मन में।
दुःसाध्य, दुर्बोध, दुर्गम्य  बन  उसे  रोकूँगा।
तेरी  रक्षा  में  सदा  तत्पर  रहूँगा।

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