7607529597598172 हिंदी पल्लवी: कुछ नहीं ...बस..

सोमवार, 18 मई 2020

कुछ नहीं ...बस..



ये कलम भी न बस
अंगद पाँव हो गई है।

न फटी बिवाई की 
गहराई में जाकर 
झाँकने को तैयार है।

न रेल की पटरी पर 
बिछी रोटियों को 
चुनने के आतुर है।

न मदिरालय की 
लंबी  पंक्तियाँ को
गिनने को बेकरार है।

न तरबतर  बेटे पर 
लदी माँ के आँसू 
लोकने का प्यार है।

न घेरे में  पादुका रखे
साथ बैठे की सोचती 
कि बुद्धि की मार है।

बस सारे दिन सुस्त सी
पड़ती है , पढ़ती है,
सुनती है ,कहती है।


मुझे  चलाना तब जब
इनमें से  तुम्हें एक भी
बदलने से  सरोकार  है।

पल्लवी गोयल 
चित्र गूगल से साभार

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