ओ कारे कजरारे बदरा
पिघल पिघल धरती पर आ रे!
अमिय सुधा सम थाती अपनी
धरती का वरदान बना दे!
औंधे मुँह पड़ी नील गागर में
लहर लहर जल लहरा दे ।
वाष्प समुन्दर बन गगन की शोभा
लघु बूंद बन ,जीवन नहला दे।
पल्लव पर गिर उषा काल में
कोमल रूप ले पल्लवी कहला रे!
सीप के मुख में बैठे बैठे
सीपज बन किरन चमका दे।
तरुणी के केश तले बंध
ढलक ढलक सौंदर्य बरसा दे।
माँ के भीतर शरण तू पा ले
छलका पय अमृत बन जा रे।
ओ कारे! मतवाला बन कर
उमड़ घुमड़ तू शोर मचा रे !
पल्लवी गोयल
चित्र गूगल से साभार
सुन्दर रचना...
जवाब देंहटाएंआदरणीय
हटाएंप्रोत्साहन के लिए ह्रदय से आभार ।
साधर
काले बादल बारिश के साथ मन के आवेग को बढ़ा देता हैं ...
जवाब देंहटाएंनए से छंद लेकर बुनी है रचना ... बहुत लाजवाब रचना ...
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय दिगम्बर जी। आपकी प्रतिक्रिया सदैव उत्साहवर्धन करती है
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